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बृहत्संहिता • अध्याय 68 • श्लोक 111
मर्त्यसत्त्वसंयुतो गीतभूषणप्रियः । संविभागशीलवान् नित्यमेव मानवः ॥
मनुष्य प्रकृति वाला मनुष्य गान और भूषण का प्रिय तथा बन्धुओं का उपकार करने वाला होता है।
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