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अध्याय 15 — पञ्चदशोल्लासः

कुलार्णव
96 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! मैं पुरश्चरण के लक्षण सुनना चाहती हूँ। हे परमेश्वर! स्थान एवं आहारादि के भेद मुझे बताइये।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने मुझसे पूछा है, उसे कहूँगा। उसके सुनने मात्र से मन्त्र का तत्त्व ज्ञात होता है।
जप-यज्ञ से बड़ा अन्य कोई यज्ञ इस संसार में नहीं है। इसलिये 'जप' के द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करे।
सब धर्मों को छोड़कर बिना किसी प्रमाद के मन्त्रराज का अभ्यास करे। प्रमाद अर्थात् विधि विधान की उपेक्षा करने से हानि होती है और विधि से सिद्धि होती है।
भोग और मोक्ष के सङ्कल्प से, कल्प और व्रत से 'जप' शुभदायक होता है। 'जप' और ध्यानमय होने से ही योग होता है। अतः हे देवि! वैसा विधिपूर्वक आचरण करे।
नियमों के अतिक्रमण और ज्ञान अज्ञान में किये गये कर्मों से उत्पत्र जन्म जन्मान्तर के सभी दोष 'जप' से नष्ट हो जाते हैं।
दुःखमय संसार में यदि अपने कल्याण की इच्छा है, तो पञ्चाङ्ग उपासना से मन्त्र जप करता हुआ सुख से रहे।
१. तीनों काल की नित्यपूजा, २. जप, ३. तर्पण, ४. होम और ५. ब्राह्मणभोजन - यह 'पुरश्चरण' कहा जाता है।
जो-जो अङ्ग न हो सके, उसकी संख्या का दुगना जप करे। अथवा हे प्रिये! अशक्त होने पर भक्तिपूर्वक अष्टाङ्ग‌सिद्धि के लिए क्रमशः अङ्गों का द्वि-त्रि-चतुः पञ्चसंख्यक जप करे। अन्यथा अङ्गहीनता के दोष से अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती।
चतुर्विध अन्न के पदार्थों से, जो छः रसों से युक्त हों, विप्रो को भोजन कराकर सन्तुष्ट करे, तो सभी कर्म सफल होते हैं।
इस पञ्चाङ्ग उपासना से जो एक मन्त्र को सिद्ध कर लेता है, उसे सभी मन्त्र, हे कुलेश्वरि! आपकी कृपा से सिद्ध हो जाते हैं।
उपदेश के सामर्थ्य से, श्रीगुरु की प्रसन्नता से और मन्त्र के प्रभाव से एवं भक्ति से मन्त्र सिद्ध हो जाते हैं।
सिद्ध गुरु से प्राप्त मन्त्र से सिद्धि प्राप्त होती है, अथवा पूर्वजन्म में किए मन्त्राभ्यास से शीघ्र सिद्धि मिलती है।
हे कुलेशानि! परम्परा के क्रम से दीक्षापूर्वक विधिविधान पूर्वक जो मन्त्र मिलता है, वह सिद्ध होता है, इसमें सन्देहं नहीं।
भूतलिपि से मन्त्र को सम्पुटित कर एक मास तक जो क्रमशः एक सहस्र जप करता है, उसे मन्त्र सिद्ध हो जाता है। मातृकाक्षरों से सम्पुटित मन्त्र को अनुलोम क्रम एवं विलोम क्रम से एक सहस्र जप करने से मन्त्र सिद्धि होती है।
मातृका के जप मात्र से कोटि मन्त्रों का जप हो जाता है क्योंकि सभी मन्त्र मातृका से ही उत्पन्न हुए हैं।
अनेक कोटि मन्त्र चित्त को व्याकुल करने वाले हैं। गुरुकृपा से प्राप्त एक मन्त्र ही सभी सिद्धियों का देने वाला है।
अचानक सुने या देखे हुए मन्त्र, या छल से प्राप्त मन्त्र, या किसी पन्ने पर लिखे मन्त्र का जप करने से हानि होती है।
पुस्तक में लिखे मन्त्रों को देखकर जो जपते हैं, उन्हें ब्रह्महत्या के समान दुःखदायी पाप लगता है।
पुण्यक्षेत्र, नदीतट, गुफा, पर्वतशिखर, तीर्थस्थान, नदियों का सङ्गम, तपोवन, उद्यान, विल्वमूल, पर्वततट, देवमन्दिर, समुद्रतट और अपना घर मन्त्र साधकों के लिए ये साधना स्थान प्रशस्त कहे गए है अथवा साधक का जहाँ चित्त प्रसन्न हो, वहाँ निवास करना चाहिए।
सूर्य, अग्नि, गुरु, चन्द्रमा, दीपक, जल, गाय, विप्र और कुल वृक्षों के समीप जप करना श्रेयस्कर है।
घर में सौगुना, गोष्ठ में लाख गुना, देवमन्दिर में करोड़ गुना और शिव के निकट जप करने का अनन्त फल होता है।
म्लेच्छ, दुष्ट, पशु, सर्पादि की शङ्का और भीति से रहित, एकान्त, पवित्र, अनिन्दित, भक्तियुक्त, स्वदेश, धार्मिक देश, अन्नादि से सम्पत्र, उपद्रव हीन (विघ्नरहित), रमणीय और तपोवन में निवास करे।
जिस मार्ग से राजा, मन्त्री, राजकीय पुरुष और बहुत से लोग आते जाते हों, उसके पास मन्त्रज्ञ निवास न करे।
जीर्ण देवमंदिर में, दग्ध वृक्ष के नीचे, नदी, तालाब, कुएँ और भू छिद्रों में वास न करे।
दीपनाथ की पूजा किए बिना जो जप पूजादि करता है, उसका केवल परिश्रम ही होता है। उसके फल को दीपनाथ हर लेते हैं।
बांस, पत्थर, मिट्टी, लकड़ी, तृण और पत्तों से बने आसनों को बुद्धिमान साधक त्याग दे। ये आसन दरिद्रता, व्याधि और दुःख देते हैं ।
तूल, कम्बल, वस्त्र या सिंह, व्याघ्र, मृगचर्म का आसन बनाए, जो सौभाग्य और ज्ञान की वृद्धि करते हैं।
पद्म, स्वस्तिक, बीरादि आसनों से बैठकर जपार्चन आदि करे। अन्यथा फल नहीं मिलता।
तीन मात्रा वाले 'प्रणव' (ॐ) को बुद्धि द्वारा बारह बार जपता हुआ अन्तःस्थ वायु को पिङ्गला (दाहिने नाक) से छोड़े - यह रेचक है।
सोलह बार 'तार' (ॐ) को जपता हुआ बाह्य मारुत (वायु) को इडा (बाँए नासिका) से भरे - यह 'पूरक' है।
बारह बार 'तार' (ॐ) को जपता हुआ मध्य में वायु का 'कुम्भक' करे। वायुबीज (यं) से देह का 'शोषण करे। फिर पूर्ववत् वायु को निकालकर भरे और कुम्भक करे और अग्निबीज (रं) से देह का 'दाहन' करे। पुनः पूर्ववत् वायु को निकालकर भरे और कुम्भक करे तथा शिव एवं कुण्डलिनी के योग के योग से उत्पन्न अमृतधारा से हे देवि! पैर से मस्तक तक देह का 'प्लाबन' करे।
जप और ध्यान से रहित प्राणायाम 'अगर्भ' होता है। 'अगर्भ' की अपेक्षा 'सगर्भ' प्राणायाम सौ गुना अधिक फलदायक है।
तप, तीर्थयात्रा, यज्ञ, दान, व्रत आदि 'प्राणायाम' की १६ वीं कला के भी बराबर नहीं है।
उक्त तीनों 'प्राणायाम' मानस, वाचिक और कायिक - सभी पापों को तुरन्त भस्म कर देते हैं।
जैसे धौंकनी द्वारा फूंकी गई धातुओं का मैल जल जाता है, वैसे ही प्राण का संयम करने से इन्द्रियों के दोष नष्ट हो जाते हैं।
प्राणायामों द्वारा विशुद्ध आत्मा वाला साधक जो जो भी कार्य करता है, वह सभी बिना प्रयत्न के फलदायक होता है, इसमें सन्देह नहीं।
आगमोक्त मार्ग से जो नित्य न्यास करता है, वह देवभाव को पाकर मन्त्रसिद्धि को प्राप्त करता है।
न्यास, कवच और छन्द से युक्त मन्त्र का जो जप करता है, हे प्रिये! उसके सभी विघ्न उसी प्रकार दूर हो जाते हैं, जैसे सिंह को देखकर हाथी भाग खड़े होते हैं।
न्यासजाल को किये बिना जो मूर्ख मन्त्र का जप करता है, उसे सभी विघ्न बाधा पहुंचाते हैं जैसे बाध मृग के बच्चों को बाधित करता है।
अक्षमाला दो प्रकार कही है - १. कल्पिता और २. अकल्पिता। कल्पिता 'मणियों' से बनती, है और अकल्पिता 'मातृकाओं' से बनती है।
'अ' से 'क्ष' तक के वर्णों से निर्मित होने के कारण इसे 'अक्षमाला' कहते हैं। अनुलोम क्रम से और विलोम क्रम से मन्त्रज्ञ साधक को जप की गणना करनी चाहिए।
अंगुलि से जप की गणना का फल एक गुना, रेखाएँ खींच कर गणना करने का फल दस गुना, मणियों से गणना करने का फल सौ हजार गुना और माणिक्य से गणना करने का अनन्त फल कहा गया है।
३० मणियों की माला से धन, २७ मणियों की माला से पुष्टि, २५ मणियों की माला से मोक्ष और १५ मणियों की माला से अभिचार होता है। हे कुलेशानि! ५० मणियों की माला से सर्वसिद्धि होती है।
अंगुष्ठ से मोक्ष, तर्जनी से शत्रुनाश, मध्यमा से धनप्राप्ति, अनामिका से शान्तिकर्म, कनिष्ठा से स्तम्भन और सभी अँगुलियों से आकर्षण होता है।
आदि में 'इतना जप करूँगा' इस प्रकार सङ्कल्प कर मन्त्रज्ञ स्थिर आसन से बैठ कर जप करे और जल सहित देवी को जप का फल समर्पित करे।
हे देवि! जप तीन प्रकार का कहा गया है - १. उच्च स्वर से जप अधम है, २. उपांशु जप मध्यम कहा गया है, और ३. मानस जप उत्तम है।
बहुत धीमे जप करने से व्याधि होती है और बहुत तेज जप करने से तप का नाश होता है। अक्षर से अक्षर को जोड़ता हुआ जो मन्त्र जप करता है उसे सिद्धि नहीं प्राप्त होती है। हे देवि! मन में स्तोत्र का स्मरण करना और वाणी से मन्त्र का जप करना - ये दोनों निष्फल होते हैं, जैसे टूटे हुए बर्तन में जल नहीं ठहरता।
आदि में जातसूतक और अन्त में मृतसूतक होता है। इन दोनो सूतकों से युक्त जो मन्त्र होता है वह सिद्ध नहीं होता।
अतः इन दोनों से मन्त्र को सदा रहित कर मन्त्र का जप करे क्योंकि दोनों सूतकों से मुक्त मन्त्र ही सब सिद्धियों को देता है।
मन्त्रार्थ, मन्त्रचैतन्य और योनिमुद्रा को जो नहीं जानता, वह सौ कोटि जप करे, तो भी उसे सिद्धि नहीं मिलती।
हे प्रिये! जिन मन्त्रों के बीज सुप्त हैं, वे फल नहीं देते। चैतन्य मन्त्र ही सर्वसिद्धिप्रद कहे गए हैं।
चैतन्यरहित मन्त्र केवल वर्ण कहे गये है। वे लक्ष कोटि जप से भी फल नहीं देते।
मन में एक बार मन्त्र के उच्चारण करने से उनका जैसा प्रभाव पहले होता है, वैसा ही प्रभाव शत, सहस्त्र, लक्ष या कोटि जप करने पर भी होता है।
हे कुलेश्वरि! किन्तु चैतन्ययुक्त मन्त्र का एक बार भी उच्चारण करने से हृदय में कम्पन, ग्रन्थिभेद, सभी अङ्गों में वृद्धि, आनन्दाश्रु, पुलक, देहावेश, गद्‌गद् वाणी आदि का अचानक ही अनुभव होता है। इसमें संशय नहीं। इस प्रकार के लक्षण दिखने पर समझे कि मन्त्र परम्परा से प्राप्त है।
मन्त्र के ये दोष हैं - १. रुद्ध, २. कूटाक्षर, ३. मुग्ध, ४. बद्ध, ५. क्रुद्ध, ६. भेदित, ७. बाल, ८. कुमार, ९. युवक, १०. प्रौढ़, ११. वृद्ध, १२. गर्वित, १३. स्तम्भित, १४. मूर्छित, १५. मत्त, १६. कीलित, १७. खण्डित, १८. शठ, १९. मन्द, २०. पराङ्मुख, २१. छिन्न, २२. वधिर, २३. अन्ध, २४. अचेतन, २५. किङ्कर, २६. क्षुधित, २७. स्तब्धं, २८. स्थानप्रष्ट, २९. पीड़ित, ३०. निःस्नेह, ३१. विकल, ३२. ध्वस्त, ३३. निर्जीव, ३४. खण्डितारिक, ३५. सुप्त, ३६. तिरस्कृत, ३७. नीच, ३८. मलिन, ३९. दुरासद, ४०. निःसत्त्व, ४१. निर्जित, ४२. दग्ध, ४३. चपल, ४४. भयङ्कर, ४५. निस्त्रिंश, ४६. क्रूर, ४७. फलहीन, ४८. निकृन्तन, ४९. निर्वीर्य, ५०. अमित, ५१. शप्त, ५२. रुग्ण, ५३. कष्ट, ५४. अङ्गहीन, ५५. जड़, ५६. रिपु, ५७. उदासीन, ५८. लज्जित, ५९. मोहित, ६०. अलस।
मन्त्र के इन ६० दोषों को जाने बिना जो मन्त्र का जप करता है, उसे लक्ष कोटि जप करने पर भी सिद्धि नहीं मिलती।
हे प्रिये! हे कुलनायिके! मन्त्रदोषों को दूर करने वाले दस संस्कार ये है - १ जनन, २ जीवन, ३ ताडन, ४ बोधन, ५ अभिषेक, ६ विमलीकरण, ७ आप्यायन, ८ तर्पण, ९ दीपन एवं १० गुप्ति । सान पर चढ़ाने से जैसे शस्त्र तेज धार वाले होते है, वैसे ही इन दस संस्कारों से मन्त्र स्फूर्ति को प्राप्त करते हैं।
मन्त्रसाधकों को विहित शाक, फल, दूध सकरकन्द आदि मूल, सक्तु एवं यव आदि हविष्य का भोजन करना चाहिए।
जिसके अन्न, पान आदि से शरीर पुष्ट होकर धर्म का सञ्चय करता है, उस अन्नदाता को साधक के कर्म का आधा फल मिलता है, इसमें कदापि सन्देह नहीं है।
अतः हे ईश्वरि! पुरश्चरणकाल में और काम्य कर्मों में भी विद्वान् साधक प्रयत्न करके पराए अत्र को न ग्रहण करे।
कहा भी है कि दूसरे के अन्न से जिसकी जीभ जली हुई है; दान लेने से जिसके दोनों हाथ जले हुए हैं और पराई स्त्री का चिन्तन करने से जिसका मन जला हुआ है, उसे कार्य में सिद्धि कैसे मिल सकती है?
सिद्धादि (अकथह) चक्र का प्रयोग मन्त्र साफल्य के ज्ञान के लिए होता है। इसी प्रकार नक्षत्र, राशि, कुलाकुल चक्रों से मन्त्र के सम्बन्ध में विचार कर ले । मन्त्र चार प्रकार के है - १. सिद्ध, २. साध्य, ३. सुसिद्ध, ४. अरि। इनमें से प्रत्येक के चार भेद है। यथा:- सिद्ध - १. सिद्ध-सिद्ध, २. सिद्ध-साध्य, ३. सिद्ध-सुसिद्ध, ४. सिद्ध-अरि। साध्य - १. साध्य-सिद्ध, २. साध्य-साध्य, ३. साध्य-सुसिद्ध, ४. साध्य-अरि। सुसिद्ध - १. सुसिद्ध-सिद्ध, २. सुसिद्ध-साध्य, ३. सुसिद्ध-सिद्ध, ४. सुसिद्ध-अरि। अरि - १. अरि-सिद्ध, २. अरि-साध्य, ३. अरि-सुसिद्ध, ४. अरि-रिपु।
१. 'सिद्ध-सिद्ध मन्त्र जप द्वारा सिद्ध होता है। २. 'सिद्ध-साध्य' दूने जप से और ३. 'सिद्ध-सुसिद्ध' आधे जप से सिद्ध होता है। ४. 'सिद्धधारि' मन्त्र का जप करने से बन्धु-बान्धव का नाश होता है।
५. 'साध्य-सिद्ध' कठिनाई से सिद्ध होता है। ६. 'साध्य-साध्य' मन्त्र का जप व्यर्थ होता है। ७. 'साध्य सुसिद्ध भजन करने से सिद्ध होता है और ८. 'साध्यारि' के जप से वंशजों का नाश होता है।
९. 'सुसिद्ध सिद्ध' आधे जप से, १०. 'सुसिद्ध-साध्य' यथोक्त जप से, ११. 'सुसिद्ध-सुसिद्ध' ग्रहण मात्र में सिद्ध होता है। १२. 'सुसिद्धारि' अपने वंश का नाशक होता है।
१३. 'अरि-सिद्ध' पुत्र का, १४. 'अरि-साध्य' पत्नी का, १५. 'अरि-सुसिद्ध' कुल का और १६. 'अरि-अरि' अपनी आत्मा (स्वयं) का नाश करता है।
इस प्रकार सिद्ध मन्त्र बान्धव, साध्य मन्त्र सेवक, सुसिद्ध मन्त्र पोषक और अरि मन्त्र घातक माने गये हैं।
नौ, पाँच ( = बाण) और एक खाने के वर्ण बान्धव हैं। दो, छः और दसवें खाने के वर्ण सेवक हैं। तीन (स्वाहा), ग्यारह (रुद्र) एवं सात (मुनि) खाने के वर्ण पोषक हैं। १२, ८, ४ खानों के वर्ण घातक हैं। अर्थात् ९, ५, १ खाने के वर्ण सिद्ध होते हैं। २, ६, १० खाने के वर्ण साध्य हैं। ३, ११, ७ खाने के वर्ण सुसिद्ध हैं। १२, ८, ४ खाने के वर्ण अरि मन्त्र होते हैं।
अश्विनी से लेकर रेवती तक २७ नक्षत्रों के चक्र में रखने का वर्णों को रखने का क्रम- प्राप - २, १ अ। लोभा ३, ४ = आ। पटु-१, १ उ। प्राह्यं -२, १ अद्रि-२। रुद्र-२, २ अः। करम् - १, २ लोप -३, १। पटु-१, १। प्राह्य - १, १। ख लो घो-२, ३, ४। अर्थात् २, १, ३, ४, १९ १, २, १, २, २, १, २, २, १, २, ३, १, ३, १, १, १, २, १, २, ३, ४ इन २६ गृहों में अकारादि स्वरों और व्यञ्जन वर्णों को रखना चाहिए। किन्तु २७ वें गृह में ल, क्ष, अं, अः- इन चार वर्णों को रक्खे।
१. जन्म, २. सम्पद्, ३. विपत्, ४. क्षेम, ५. प्रत्यरि, ६. साधक, ७. वध, ८. मित्र और ९. परम मित्र - ये ९ नक्षत्रों के गृहों के गुण के अनुसर नाम हैं। साधक के जन्म नक्षत्र से मन्त्र के नक्षत्र को मिलाकर गृहों के गुण के अनुसार फल की गणना करनी चाहिए।
मेषादि १२ राशियों के गृहों में वर्षों को रखने का क्रम यह है - बा = ४, लं = ३, गौ = ३, रम् = २, खु = २, (१६ स्वर), शो = ५, णं = ५, श = ५, मी = ५, शो ५ और भ = ४ (२९ व्यञ्जन)। अर्थात् कन्या में श, ष, स और ह ये चार वर्ण होंगे। विमर्श - शारदातिलक ६-३, बृहत्तन्त्रसार पृ० ११ (दसवां संस्करण) एवं रुद्रयामल ३. ६२-६५ में कुछ भिन्न क्रम वर्णित है।
बारह राशियों के क्रमशः द्वादश (पारिभाषिक) नाम (उनके फल के अनुसार) इस प्रकार हैं - १. लग्न, २. धन, ३. भ्रातृ, ४. बन्धु, ५. पुत्र, ६. कलत्र, ८. मरण, ९. धर्म, १०. कर्म, ११. आय और १२. व्यय।
बुद्धिमान् साधक राशि चक्र में गणना अपनी राशि से आरम्भ करे, अर्थात् अपनी राशि जिस गृह में हो वहाँ से गणना का आरम्भ होता है। यह गाना मन्त्र की राशि तक की जाती है। यदि अपनी राशि अज्ञात हो तो गणना अपने नाम की राशि से प्रारम्भ की जाती है।
इस चक्र में गणना करने पर १. यदि मन्त्राक्षर संख्या साधक (साध्याङ्क) की संख्या से अधिक हो तो मन्त्र ऋणि कहा जायगा और यदि मन्त्राक्षर संख्या साध्याङ्क से कम हो तो मन्त्र धनी होगा। इस प्रकार यदि साध्याङ्क अधिक हो तो मन्त्र धनी है और यदि साध्याङ्क कम हो तो मन्त्र ऋणि होगा। यदि दोनों की संख्या एक ही हो जाय तो अऋणि होगा। साध्य नाम के प्रथमाक्षर से आरम्भ कर मन्त्राक्षर के प्रथमाक्षर तक गणना करनी चाहिए । इस प्रकार जो संख्या प्राप्त हो उसे तीन से गुणा करे। फिर उस गुणाङ्क को सात भाग में विभक्त करने पर साधक का अङ्क प्राप्त हो जाता है। पुनः विलोम क्रम से मन्त्र के प्रथमाक्षर से लेकर साधक के नाम के प्रथमाक्षर तक गणना करने पर उसे तीन से गुणा कर लब्धाङ्क को सात से भाग देने पर मन्त्र की संख्या प्राप्त होगी। यदि साध्याङ्क कम है तो मन्त्र ऋणि कहा जायेगा और ऋणि मन्त्र को ग्रहण करना मङ्गलकारक होता है।
अकार से क्षकार पर्यन्त ५० वर्षों को ५ भागों में विभक्त करना चाहिए। प्रत्येक भाग एक-एक पृथ्वी आदि तत्त्वों को सूचित करता है। इनका विभाग इस प्रकार होगा - १. वायु - अ आ ऐकचटतपय व. २. अग्नि - इ ई ए ख छ ठ थफरक्ष, ३. पृथ्वी - उ ऊ ओ गज ड द व लळ, ४. जल - ऋऋऔघ झढ ध भवस, ५. आकाश - लू लू अंङञण न म श ह।
पृथ्वी तत्त्व और जल तत्त्व में मित्रता है तथा अग्नि तत्त्व एवं वायु में शत्रुता है। किन्तु आकाश सभी तत्त्वों का मित्र है। अतः हे कुलेश्वरि! जहाँ मन्त्राक्षर एवं साधकाक्षर में परस्पर मित्र हों वे शुभ हैं। यदि शत्रुता वाले गृह से मन्त्राक्षर ग्रहण किया गया है तो वह साधक के लिए हानिप्रद ही होगा। अतः शत्रुभाव के मन्त्र को त्याग देना चाहिए।
हे मन्त्रनायिके! एकाक्षरमन्त्र, कूटमन्त्र, त्रिपुरामन्त्र, स्त्री द्वारा दिए गए मन्त्र और स्वप्न में प्राप्त मन्त्र के सम्बन्ध में सिद्धादि का विचार न करे।
हे देवेशि! इसी प्रकार सिद्ध पुरुष के द्वारा उपदिष्ट, चारों आम्नायों से उत्पन्न और मालामन्त्रों के सम्बन्ध में सिद्धादि का शोधन न करे।
नृसिंह, सूर्य, वाराह, प्रासाद, प्रणव, सपिण्डाक्षर वाले मन्त्रों के सम्बन्ध में भी सिद्धादि का विचार न करे।
हे वरारोहे! मन कहीं हो, शिव कहीं हो, शक्ति कहीं हो और प्राण कहीं और हो, तो लक्ष कोटि जप से भी सिद्धि नहीं मिलती।
हे वरानने! विवाद के लिए विद्या पढ़े, दूसरे के लिए जप करे, ख्याति के लिए दान दे, तो हे वरानने! सिद्धि कैसे मिले?
धन के लिए तीर्थ में जाय, दम्भ के लिए तप करे, स्वार्थ के लिए देवपूजा करें, तो सिद्धि कैसे हो?
हे प्रिये! अशुद्ध देह से न्यास, देवपूजा, जप और होम जो मूर्ख करते हैं, उनका सारा कर्म निष्फल होता है।
हे प्रिये! मलमूत्र का त्याग किए बिना जो कर्म करता है, उसका जप पूजनादि सभी अपवित्र होता है।
मैले वस्त्र, केशादि और दुर्गन्धित मुख से युक्त जो जप करता है, उससे देवता रुष्ट होकर उसका शीघ्र ही नाश करते हैं।
आलस्य, जंभाई, नींद, भूख, प्यास, धूकना, भय, नीचाङ्ग का स्पर्श और क्रोध - इस सबको जपकाल में दूर रखे।
१. अधिक भोजन, २. प्रलाप, ३. वाद-विवाद, ४. नियमाग्रह और ५. पराई स्त्री या ६. अन्य लोगों का साथ इन छः बातों से मन्त्र सिद्ध नहीं होता।
टोपी पहनकर, कंचुकी धारण कर, नग्न और मुक्त केश होकर, लोगों से घिर कर, अपवित्र उत्तरीय धारण कर, अशुद्धावस्था में अथवा चलते हुये जप न करे।
जपकाल में जड़ता, दुःख, तिनका तोड़ना, विवाद या घमण्ड और अधोवायु का त्याग न करे।
हे प्रिये! शान्त, पवित्र, अल्पाहारी, भूमि पर शयन करने वाला, भक्तिमान्, अनुशासनपूर्ण, निर्द्वन्द्व, स्थिरचित्त, मौनी और संयतात्मा होकर जप करे।
साथ ही साधक को विश्वास, आस्तिकता, करुणा, श्रद्धा, नियमपालन, दृढ़ निश्चय, सन्तोष, उत्सुकता और धर्मनिष्ठा आदि गुणों से युक्त होकर जप करना चाहिए।
सुगन्धि, पुष्प, आभूषण और वस्त्रों से अलंकृत साधक के हाथ में सिद्धि रहती है। अन्य को कोटि जप से भी सिद्धि नहीं मिलती।
हे प्रिये! इष्टदेव में निष्ठा, उन्हीं में प्राण, उन्हीं में चित्त, उन्हीं के तत्त्व चिन्तन में लगा हुआ जप करे।
जप से थक कर पुनः ध्यान करे। ध्यान से थक कर पुनः जप करे। इस प्रकार जप ध्यान से युक्त रहने वाले साधक को शीघ्र ही सिद्धि मिलती है।
इस प्रकार मैंने पुरश्चरण के कुछ लक्षण संक्षेप में आपसे कहे। अब हे कुलेशानि! आप क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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