पूजा त्रैकालिकी नित्यं जपस्तर्पणमेव च ।
होमो ब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते ॥
१. तीनों काल की नित्यपूजा, २. जप, ३. तर्पण, ४. होम और ५. ब्राह्मणभोजन - यह 'पुरश्चरण' कहा जाता है।
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