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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 75
नामाद्यक्षरमारभ्य यावन्मन्त्रादिमाक्षरम् । त्रिधा कृत्वा स्वरैभिन्दयात्तदन्यद्विपरीतकम् ॥ कृत्वाधिकमृर्ण ज्ञेयं ऋणी चेन्मन्त्रवित्तमः । स्वयमृणी चेत्तन्मन्त्रं जपेत्पूर्वमृणी यतः ॥
इस चक्र में गणना करने पर १. यदि मन्त्राक्षर संख्या साधक (साध्याङ्क) की संख्या से अधिक हो तो मन्त्र ऋणि कहा जायगा और यदि मन्त्राक्षर संख्या साध्याङ्क से कम हो तो मन्त्र धनी होगा। इस प्रकार यदि साध्याङ्क अधिक हो तो मन्त्र धनी है और यदि साध्याङ्क कम हो तो मन्त्र ऋणि होगा। यदि दोनों की संख्या एक ही हो जाय तो अऋणि होगा। साध्य नाम के प्रथमाक्षर से आरम्भ कर मन्त्राक्षर के प्रथमाक्षर तक गणना करनी चाहिए । इस प्रकार जो संख्या प्राप्त हो उसे तीन से गुणा करे। फिर उस गुणाङ्क को सात भाग में विभक्त करने पर साधक का अङ्क प्राप्त हो जाता है। पुनः विलोम क्रम से मन्त्र के प्रथमाक्षर से लेकर साधक के नाम के प्रथमाक्षर तक गणना करने पर उसे तीन से गुणा कर लब्धाङ्क को सात से भाग देने पर मन्त्र की संख्या प्राप्त होगी। यदि साध्याङ्क कम है तो मन्त्र ऋणि कहा जायेगा और ऋणि मन्त्र को ग्रहण करना मङ्गलकारक होता है।
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