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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 55
हत्कण्ठग्रन्थिभेदश्च सर्वावयववर्द्धनम् । आनन्दाश्नु च पुलको देहावेशः कुलेश्वरि । गद्गदोक्तिश्च सहसा जायते नात्र संशयः ॥ सकृदुच्चरितेऽप्येवं मन्त्रे चैतन्यसंयुते । दृश्यन्ते प्रत्यया यत्र पारम्पर्य तदुच्यते ॥
हे कुलेश्वरि! किन्तु चैतन्ययुक्त मन्त्र का एक बार भी उच्चारण करने से हृदय में कम्पन, ग्रन्थिभेद, सभी अङ्गों में वृद्धि, आनन्दाश्रु, पुलक, देहावेश, गद्‌गद् वाणी आदि का अचानक ही अनुभव होता है। इसमें संशय नहीं। इस प्रकार के लक्षण दिखने पर समझे कि मन्त्र परम्परा से प्राप्त है।
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