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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 77
महीसलिलयोर्मित्रमनिलानलयोरपि शात्रवं वैपरीत्येन मैत्रं सर्वत्र चापरम् ॥ परस्परविरुद्धानां वर्णानां यत्र सङ्गतिः । वर्जयेत्तादृशं मन्त्रं नाशकृत्तत् कुलेश्वरि ॥
पृथ्वी तत्त्व और जल तत्त्व में मित्रता है तथा अग्नि तत्त्व एवं वायु में शत्रुता है। किन्तु आकाश सभी तत्त्वों का मित्र है। अतः हे कुलेश्वरि! जहाँ मन्त्राक्षर एवं साधकाक्षर में परस्पर मित्र हों वे शुभ हैं। यदि शत्रुता वाले गृह से मन्त्राक्षर ग्रहण किया गया है तो वह साधक के लिए हानिप्रद ही होगा। अतः शत्रुभाव के मन्त्र को त्याग देना चाहिए।
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