यद् यदङ्ग विहीयेत तत्संख्याद्विगुणो जपः । कुर्याद् द्वित्रिचतुःपञ्च-संख्यां वा साधकः प्रिये ॥
कुर्वीत चाङ्गसिद्ध्यर्थं तदशक्तौ स भक्तितः । तच्वेदङ्ग विहीयेत मन्त्री नेष्टमवाप्नुयात् ॥
जो-जो अङ्ग न हो सके, उसकी संख्या का दुगना जप करे। अथवा हे प्रिये! अशक्त होने पर भक्तिपूर्वक अष्टाङ्गसिद्धि के लिए क्रमशः अङ्गों का द्वि-त्रि-चतुः पञ्चसंख्यक जप करे। अन्यथा अङ्गहीनता के दोष से अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती।
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