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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 30
द्वादशावर्त्तयन् बुद्ध्या प्रणवन्तु त्रिमात्रकम् । मुश्चेत् पिङ्गलया वायुमन्तः स्थं रेचको भवेत् ॥
तीन मात्रा वाले 'प्रणव' (ॐ) को बुद्धि द्वारा बारह बार जपता हुआ अन्तःस्थ वायु को पिङ्गला (दाहिने नाक) से छोड़े - यह रेचक है।
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