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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 89
उष्णीशी कञ्चकी नग्नो मुक्तकेशो गणावृतः । अपवित्रोत्तरीयश्चाशुचिर्गच्छंश्च नो जपेत् ॥
टोपी पहनकर, कंचुकी धारण कर, नग्न और मुक्त केश होकर, लोगों से घिर कर, अपवित्र उत्तरीय धारण कर, अशुद्धावस्था में अथवा चलते हुये जप न करे।
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