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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 71
जन्म सम्पद् विपत् क्षेम प्रत्यरिः साधको वधः । मित्रं परममित्रच जन्मादीनि पुनः पुनः ॥
१. जन्म, २. सम्पद्, ३. विपत्, ४. क्षेम, ५. प्रत्यरि, ६. साधक, ७. वध, ८. मित्र और ९. परम मित्र - ये ९ नक्षत्रों के गृहों के गुण के अनुसर नाम हैं। साधक के जन्म नक्षत्र से मन्त्र के नक्षत्र को मिलाकर गृहों के गुण के अनुसार फल की गणना करनी चाहिए।
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