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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 51
मन्त्रार्थं मन्त्रचैतन्यं योनिमुद्रां न वेत्ति यः । शतकोटिजपेनापि तस्य सिद्धिर्न जायते ॥
मन्त्रार्थ, मन्त्रचैतन्य और योनिमुद्रा को जो नहीं जानता, वह सौ कोटि जप करे, तो भी उसे सिद्धि नहीं मिलती।
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