'अ' से 'क्ष' तक के वर्णों से निर्मित होने के कारण इसे 'अक्षमाला' कहते हैं। अनुलोम क्रम से और विलोम क्रम से मन्त्रज्ञ साधक को जप की गणना करनी चाहिए।
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