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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 63
इन्द्राग्निरुद्रग्रहदृग्वेदार्कदिक्षडष्टसु षोडशमनुबाणाब्धितिथित्रयोदशस्वपि ॥ लिखेत् षोडशकोष्ठेषु मातृकार्णान् विचक्षणः । स्वनामाद्यक्षराद् यावन्मन्त्राद्यक्षरदर्शनम् ॥ सिद्धादीन् कल्पयेन्मन्त्री कुर्यात् साध्यादिभिः पुनः । चतुश्चतुर्विभागेन सिद्धादीन् गणयेत् पुनः ॥
सिद्धादि (अकथह) चक्र का प्रयोग मन्त्र साफल्य के ज्ञान के लिए होता है। इसी प्रकार नक्षत्र, राशि, कुलाकुल चक्रों से मन्त्र के सम्बन्ध में विचार कर ले । मन्त्र चार प्रकार के है - १. सिद्ध, २. साध्य, ३. सुसिद्ध, ४. अरि। इनमें से प्रत्येक के चार भेद है। यथा:- सिद्ध - १. सिद्ध-सिद्ध, २. सिद्ध-साध्य, ३. सिद्ध-सुसिद्ध, ४. सिद्ध-अरि। साध्य - १. साध्य-सिद्ध, २. साध्य-साध्य, ३. साध्य-सुसिद्ध, ४. साध्य-अरि। सुसिद्ध - १. सुसिद्ध-सिद्ध, २. सुसिद्ध-साध्य, ३. सुसिद्ध-सिद्ध, ४. सुसिद्ध-अरि। अरि - १. अरि-सिद्ध, २. अरि-साध्य, ३. अरि-सुसिद्ध, ४. अरि-रिपु।
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