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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 4
सर्वपादान् परित्यज्य मन्त्रपादं समभ्यसेत् । अप्रमादाद् भवेत् सिद्धिः प्रमादादशुभं फलम् ॥
सब धर्मों को छोड़कर बिना किसी प्रमाद के मन्त्रराज का अभ्यास करे। प्रमाद अर्थात् विधि विधान की उपेक्षा करने से हानि होती है और विधि से सिद्धि होती है।
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