बारह बार 'तार' (ॐ) को जपता हुआ मध्य में वायु का 'कुम्भक' करे। वायुबीज (यं) से देह का 'शोषण करे। फिर पूर्ववत् वायु को निकालकर भरे और कुम्भक करे और अग्निबीज (रं) से देह का 'दाहन' करे। पुनः पूर्ववत् वायु को निकालकर भरे और कुम्भक करे तथा शिव एवं कुण्डलिनी के योग के योग से उत्पन्न अमृतधारा से हे देवि! पैर से मस्तक तक देह का 'प्लाबन' करे।
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