मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 32
द्वादशावर्त्तयन् तारं वायुं मध्ये च कुम्भयेत् । शोषयेद्वायुबीजेन देहशोषणमीरितम् ॥ पुनश्च पूर्ववद्वायुं विरेच्यापूर्य कुम्भयेत् । दहेत् पुनश्च पूर्ववद्वायुं विरेच्यापूर्य कुम्भयेत् । शिवकुण्डलिनीयोगस्यन्दनामृतधारया आपादमस्तकं देवि प्लावयेत् प्लावनं भवेत् ॥ दहनबीजेन देहदाहनमीरितम् ॥
बारह बार 'तार' (ॐ) को जपता हुआ मध्य में वायु का 'कुम्भक' करे। वायुबीज (यं) से देह का 'शोषण करे। फिर पूर्ववत् वायु को निकालकर भरे और कुम्भक करे और अग्निबीज (रं) से देह का 'दाहन' करे। पुनः पूर्ववत् वायु को निकालकर भरे और कुम्भक करे तथा शिव एवं कुण्डलिनी के योग के योग से उत्पन्न अमृतधारा से हे देवि! पैर से मस्तक तक देह का 'प्लाबन' करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें