मनोऽन्यत्र शिवोऽन्यत्र शक्तिरन्यत्र मारुतः ।
न सिध्यति वरारोहे लक्षकोटिजपादपि ॥
हे वरारोहे! मन कहीं हो, शिव कहीं हो, शक्ति कहीं हो और प्राण कहीं और हो, तो लक्ष कोटि जप से भी सिद्धि नहीं मिलती।
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