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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 46
एतज्जपिष्यामीत्यादौ सङ्कल्प्य मन्त्रवित्तमः । स्थिरासनो जपित्वाऽथ देव्यै सोदकमर्पयेत् ॥
आदि में 'इतना जप करूँगा' इस प्रकार सङ्कल्प कर मन्त्रज्ञ स्थिर आसन से बैठ कर जप करे और जल सहित देवी को जप का फल समर्पित करे।
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