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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 66
सुसिद्धसिद्धोऽर्द्धजपात्तत्साध्यस्तु यथोक्ततः । तत्सुसिद्धो ग्रहादेव सुसिद्धारिः स्वगोत्रहा ॥
९. 'सुसिद्ध सिद्ध' आधे जप से, १०. 'सुसिद्ध-साध्य' यथोक्त जप से, ११. 'सुसिद्ध-सुसिद्ध' ग्रहण मात्र में सिद्ध होता है। १२. 'सुसिद्धारि' अपने वंश का नाशक होता है।
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