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कुलार्णव • अध्याय 15 • श्लोक 20
पुण्यक्षेत्रं नदीतीरं गुहा पर्वतमस्तकम् । तीर्थप्रदेशाः सिन्धूनां सङ्गमः पावनं वनम् ॥ उद्यानानि विविक्तानि विल्वमूलं तटं गिरेः । देवतायतनं कूलं समुद्रस्य निजं गृहम् ॥ साधनेषु प्रशस्तानि स्थानान्येतानि मन्त्रिणाम् । अथवा निवसेत्तत्र यत्र चित्तं प्रसीदति ॥
पुण्यक्षेत्र, नदीतट, गुफा, पर्वतशिखर, तीर्थस्थान, नदियों का सङ्गम, तपोवन, उद्यान, विल्वमूल, पर्वततट, देवमन्दिर, समुद्रतट और अपना घर मन्त्र साधकों के लिए ये साधना स्थान प्रशस्त कहे गए है अथवा साधक का जहाँ चित्त प्रसन्न हो, वहाँ निवास करना चाहिए।
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