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अध्याय 1 — पूर्वमेघः
मेघदूतम्
66 श्लोक • केवल अनुवाद
अपने कार्य से असावधान, प्रिया के विरह से दुःसह, एक वर्ष तक भोगने वाले, स्वामी के शाप से नष्ट महिमा वाला, कोई यक्ष जनक की पुत्री के स्नान से पवित्र जल वाले, घने छाया वाले वृक्षों से युक्त, रामगिरि (पर्वत) के आश्रमों में निवास करता था।
उस (पूर्वोक्त रामगिरि) पर्वत पर प्रिया से वियुक्त स्वर्ण कंगण के गिरने से शून्य कलाई वाले कामुक उस (यक्ष) ने कुछ (अर्थात् आठ) मास विताकर आषाढ़ के प्रथम दिन पर्वत की चोटी से सटे हुए वप्रक्रीड़ा में तिरछा दन्त प्रहार करने वाले हाथी के सदृश दर्शनीय मेघ को देखा।
यक्षों के राजा (कुबेर) का सेवक अन्दर ही आँसुओं को रोके हुए, उत्कण्ठा को उत्पन करने वाले उस (मेघ) के सामने किसी प्रकार ठहर कर देर तक सोचता रहा। मेघ के दर्शन होने पर सुखी (व्यक्ति) का भी चित्त दूसरे प्रकार की वृत्ति वाला (चंचल) हो जाता है, (फिर) कण्ठ के आलिङ्गन के इच्छुकजन (प्रिया) के दूर स्थित होने पर तो कहना ही क्या।
श्रावण मास के निकट आने पर प्रिया के जीवन को सहारा देने के इच्छुक उस (यक्ष) ने मेघ द्वारा अपने कुशलमय समाचार को भेजने की इच्छा से तत्काल तोड़े गये (ताजे) कूटज (पर्वतीय चमेली) के पुष्पों से अर्घ्य सामग्री तैयार करके (पूजा करके) उस (मेघ) के लिए प्रसन्नतापूर्वक प्रणय भरे वचनों से स्वागत कहा।
धूम, अग्नि, जल और वायु का मिश्रण मेघ कहाँ? और समर्थ इन्द्रियों वाले प्राणियों द्वारा भेजे जाने योग्य सन्देश रूपी वस्तु कहाँ? इसका उत्कण्ठा के कारण विचार न करते हुए यक्ष ने उस (मेघ) से याचना की, क्योंकि कामपीड़ित (व्यक्ति) चेतन और जड़ के विषय में स्वभाव से दीन (विवेकशून्य) (होते हैं)।
(हे मेघ!) तुमको संसार में प्रसिद्ध पुष्कर और आवर्तक (मेघों) के वंशो में उत्पन्न इन्द्र का इच्छानुसार रूप धारण करने वाला प्रधान पुरुष जानता हूँ। इसलिए दैवयोग से दूर स्थित बन्यु (प्रिया) वाला मैं (यक्ष) तुम्हारे विषय में याचकत्व को प्राप्त हुआ हूँ। अधिक गुण वाले से (की गयी) याचना निष्फल (भी) अच्छी (है), (परन्तु) निर्गुण से (की गयी) याचना सफल कामना वाली (भी अच्छी) नहीं।
(हे) मेघ! तुम (विरह) पीड़ितों के रक्षक हो, इसलिए कुबेर के क्रोध से (प्रिया से) वियुक्त हुए मेरे सन्देश को प्रिया के पास ले जाओ। तुम्हें बाहर के उद्यान में विद्यमान शिव के सिर पर स्थित चाँदनी से उज्ज्वल महलों से युक्त अलका नाम वाली यक्षों के स्वामी (कुबेर) की नगरी जाना है।
वायु मार्ग में (आकाश में) चढ़े हुए तुमको परदेश गये हुए व्यक्तियों की स्त्रियां (पति के शीघ्र आगमन के) विश्वास से आश्वस्त होकर बालों के अग्रभाग को ऊपर पकड़े हुए उत्कण्ठा से देखेंगी। (क्योंकि) तुम्हारे उमड़ने पर विरह से व्याकुल पत्नी की कौन उपेक्षा करेगा? दूसरा भी जो व्यक्ति मेरे समान दूसरों के अधीन आजीविका वाला न हो।
तुम बेरोक-टोक गति वाले, (विरह के शेष) दिनों की गणना में लगी हुई पतिव्रता (अपनी) उस भाभी को जीवित अवश्य देखोगे; क्योंकि आशारूपी बन्ध (तन्तु) स्त्रियों के फूल के समान (कोमल), वियोग में शीघ्र नष्ट हो जाने वाले प्रेमी हृदय को प्रायः रोके रखता है।
और जैसे कि अनुकूल वायु तुम्हें धीरे-धीरे प्रेरित कर रहा है तथा गर्व से भरा यह पपीहा तुम्हारे वाम भाग में स्थित होकर मधुर शब्द कर रहा है। निश्चय ही गर्भ धारण करने के आनन्द के अभ्यास के कारण पंक्तिबद्ध बगुलियाँ नेत्रों को सुन्दर लगने वाले आपकी आकाश में सेवा करेंगी।
और जो पृथ्वी को उगे हुए कुकुरमुत्तों वाली उपजाऊ बनाने में समर्थ है, उस कानों को सुख देने वाले तुम्हारे गर्जन को सुनकर मानसरोवर के लिए उत्सुक, कमलनाल के अग्रभाग के टुकड़ों को मार्ग का भोजन बनाने वाले राजहंस कैलाश (पर्वत) तक आकाश में तुम्हारे साथी होंगे।
मनुष्यों के वन्दनीय रामचन्द्र जी के चरणों द्वारा ढलानों पर चिह्नित, प्रिय मित्र, इस ऊँचे पर्वत को आलिङ्गन कर विदा लो। समय-समय पर आपका साहचर्य पाकर चिरकाल के वियोग से उत्पन्न गर्म वाध्य (आँसुओ) को छोड़ते हुए जिसके (रामगिरि पर्वत के) प्रेम की अभिव्यक्ति होती है।
(हे) मेघ! अब, पहले कहते हुए (मुझसे) तुम्हारी (अपनी) यात्रा के अनुकूल मार्ग को सुन लो, जिसमें (मार्ग में) बार-बार थक जाने पर पर्वतों पर पैर रखकर (विश्राम करके) तथा बार-बार क्षीण होने पर नदियों के हल्के जल का उपभोग कर (पीकर) जाओगे। उसके बाद (मार्ग सुनने के बाद) कानों के द्वारा पिये जाने वाले (सुने जाने वाले) मेरे सन्देश को सुनोगे।
वायु पर्वत की चोटी को लिये जा रहा है क्या? इस (विचार) से ऊपर को मुख किये हुए भोली-भाली सिद्धों की स्त्रियों द्वारा अत्यधिक आश्चर्य के साथ देखे गये उत्साह वाला, मार्ग में दिग्गजों की मोटी सूंडों के प्रहारों को बचाते हुए (तुम) उस सरस वेतों के स्थान से उत्तर की ओर मुख वाले होकर आकाश में उड़ जाओ।
रत्नों की कान्तियों के मिश्रण के समान दर्शनीय यह इन्द्रधुनष का टुकड़ा सामने बाँबी के अग्र भाग से निकल रहा है, जिससे तुम्हारा श्याममल शरीर उज्ज्वल कान्ति वाले मोर के पंख से गोपवेश धारण करने वाले विष्णु (कृष्ण) के श्यामल शरीर के समान अत्यन्त शोभा को प्राप्त होगा।
खेती का फल तुम्हारे अधीन है, इस कारण स्नेह से आद्र भौंहों के विलास से अपरिचित ग्रामीण स्त्रियों की आँखों से पिये जाते हुए (अत्यन्त प्रेमपूर्वक देखे जाते हुए) (तुम) माल नामक देश पर, जो तत्काल हल से जोता जाने के कारण सुगन्धित हो जायेगा, चढ़कर कुछ पश्चिम की ओर जाना (और) फिर तीव्र गति वाला होकर उत्तर की ओर ही (जाना)।
आम्रकूट पर्वत, मूसलाधार वर्षा से दावाग्नि को बुझाने वाले, मार्ग की थकान से व्याप्त तुमको अच्छी प्रकार सिर पर धारण करेगा, (क्योंकि) अधम (व्यक्ति) भी मित्र के आश्रय के लिए आने पर पहले के उपकारों को विचार कर, विमुख नहीं होता, (फिर) जो उतना ऊंचा (महान्) है, उसका तो कहना ही क्या?
पके हुए फलों से चमकते हुए वन के आमों से ढके हुए पार्श्व भागों वाला (आग्नकूट) पर्वत, चिकनी चोटी के समान रंग वाले तुम्हारे चोटी पर चढ़ने पर, मध्य भाग में काला तथा शेष विस्तार भाग पीला-सा, पृथिवी के स्तन के समान (होकर), निश्चय ही देवों के जोड़ों द्वारा देखने योग्य अवस्था को प्राप्त करेगा।
वन में विचरण करने वालों की स्त्रियों द्वारा उपभुक्त कुओं वाले उस (आम्रकूट पर्वत) पर क्षण भर ठहर कर, जल की वर्षा कर देने से अत्यन्त तीव्र गति वाला होकर, उससे (आम्रकूट से) आगे के मार्ग को पार कर, पत्थरों के कारण उबड़-खाबड़ विध्याचल की तलहटी में फैली हुई नर्मदा नदी को, हाथी के शरीर पर चित्रकारी की रेखाओं के प्रकारों से बनायी गयी शृङ्गार रेखा के समान देखोगे।
वर्षा कर चुके हुए (तुम) तीव्र गंध वाले, जंगली हाथियों के मद से सुगन्धित (और) जामुनों के कुओं द्वारा रोके गये वेग वाले उसके (नर्मदा के) जल को लेकर जाना। हे मेघ! वायु अन्दर बल से युक्त तुझको हिलाने में समर्थ न हो सकेगा; क्योंकि खाली हुए सब हल्के होते हैं (तथा) भरा हुआ होना भारीपन का कारण होता है।
आधे उगे हुए केसरों से हरे और पीले कदम्ब के पुष्पों को देखकर दलदलों में प्रथम बार प्रकट हुई कलियों वाली केलियों को खाकर वनों में पृथ्वी की अधिक सुगन्धिवाली गंध को सूंघकर हरिण जल-कणों की वर्षा करने वाले तुम्हारे मार्ग को सूचित करेंगे।
जल-बिन्दुओं के ग्रहण करने में निपुण चातकों को देखते हुए, पंक्तिबद्ध बगुलों को गिनती के द्वारा (अङ्गुलियों से) दिखाते हुए, सिद्ध लोग गर्जन के समय कँपकँपी सहित प्रिय पलियों द्वारा घबराहट से (किये गये) आलिङ्गनों को पाकर तुम्हारे प्रति कृतज्ञ होंगे।
(हे) मित्र! प्रिय (अभीष्ट) के लिए शीघ्र जाने के इच्छुक भी तुम्हें कुटज के पुष्पों से सुगन्धित प्रत्येक पर्वत पर देर हो जाने की सम्भावना कर रहा हूँ। (आनन्द के) आँसुओं से युक्त नेत्रों वाले मयूरों द्वारा अपनी वाणी को स्वागत का शब्द बनाकर अगवानी किए गये आप शीघ्र जाने का प्रयत्न करना।
(हे मेघ!) तुम्हारे पास आने पर दशार्ण देश कलियों के अग्रभाग में विकसित केतकी के पुष्पों से पीली-सी कान्ति वाले उपवनों के घेरों वाला, घर की बलि को खाने वाले (कौए आदि) पक्षियों के घोंसले की रचना से व्याप्त ग्राम की गलियों के पवित्र (पीपल आदि) वृक्ष वाले, पके हुए फलों से काले बने हुए जामुन वनों के भाग वाला और कुछ दिन ठहरे हुए हंसों वाला हो जायेगा।
दिशाओं में प्रसिद्ध विदिशा नाम वाली उसकी (दशार्ण प्रदेश की) राजधानी पहुंचकर तुरन्त कामुकता के सम्पूर्ण फल को प्राप्त करोगे, क्योंकि (तुम) मधुर, चंचल तरङ्गों वाले वेत्रवती के जल को भूभङ्ग युक्त मुख की भांति तट प्रान्त में गर्जन से सुन्दर लगते हुए पान करोगे।
वहाँ (विदिशा में) विश्राम के लिए, विकसित पुष्पों वाले कदम्बों से (युक्त) मानो, तुम्हारे सम्पर्क के कारण रोमाञ्चित हुए, "नीचैः" नाम वाले पर्वत पर ठहरना, जो वेश्याओं की रतिक्रीड़ा सम्बन्धी सुगन्य को फैलाने वाले शिलागृहों से, नागरिकों के उत्कट यौवन को प्रकट करता है।
(वहाँ नीचैः पर्वत पर) विश्राम करके वन नदी के किनारे उत्पन्न उपवनों की जूही की कलियों को नये जल की बूंदों से सींचते हुए (और) कपोलों पर पसीने को हटाने से उत्पन्न पीड़ा से मुरझा गये हैं कानों के कमल जिनके ऐसे, पुष्प तोड़ने वाली स्त्रियों (मालिनों) के मुखों को छाया देने के कारण क्षण भर परिचित होते हुए आगे बढ़ना।
उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किये हुए आपका मार्ग यद्यपि टेढ़ा (हो जायेगा), (फिर भी) उज्जयिनी के प्रासादो के ऊर्ध्व भागों के परिचय से पराङ्मुख मत होना। वहाँ नगर की सुन्दरियों की बिजली की रेखा के चमकने से चकित चञ्चल चितवन वाले नेत्रों से यदि (तुमने) आनन्द नहीं लिया तो (तुम निश्चित ही) ठगे गये।
तरंगो के चलने से शब्द करते हुए पक्षियों की पंक्ति रूपी करधनी वाली, स्खलन के कारण सुन्दर रूप में (मदमाती चाल से) बहने वाली तथा भँवर रूपी नाभि को दिखाने वाली निर्विन्ख्या नदी के मार्ग में पहुँच कर जल से पूर्ण मध्य भाग वाले हो जाना; क्योंकि स्त्रियों की प्रेमियों के प्रति शृङ्गार-चेष्टा (हाव-भाव) ही प्रथम प्रणय वाक्य होता है।
वेणी के समान बने हुए क्षीण जल वाली, तट पर उगे हुए वृक्षों से गिरने वाले सूखे पत्तों से पीली कान्ति वाली (काली) सिन्धु नदी उसको (निर्विख्या को) पार किये तेरे सौभाग्य को (अपनी) विरह की दशा से प्रकट करती हुई, जिस उपाय से (अपनी) क्षीणता छोड़ दे, हे सौभाग्यशाली मेघ! वह तुम्हें करना ही चाहिए।
जहाँ के ग्रामों के वृद्ध जन उदयन की कथाओं के जानने वाले हैं, ऐसे अवन्ति प्रदेश को प्राप्त कर, पहले बतायी गयी, सम्पति से सम्पन्न, उज्जयिनी नाम की नगरी में जाना, (जो) मानो पुण्य कर्मों के फल के कम हो जाने पर पृथ्वी पर आये हुए स्वर्ग वालों के (देवताओं के) शेष पुण्यों के द्वारा लाया गया स्वर्ग का एक उज्जवल टुकड़ा है।
जहां (उज्जयिनी में) प्रातःकाल में सारसों के तीव्र मद से अव्यक्त मधुर कूजन को अधिक बढ़ाता हुआ, खिले हुए कमलों की सुगन्ध के सम्पर्क से सुगन्धित, अङ्गों को सुख देने वाला शिप्रा नदी का पवन, (रति) याचना में मीठे वचन बोलने वाले प्रियतम के समान, स्त्रियों की सम्भोग की थकान को दूर करता है।
जिस (उज्जयिनी) में करोड़ों की संख्या में बाजारों में (बिक्री के लिए) सजाये गये, शुद्ध मध्यमणि वाले हारों को, शङ्ख और सीपियों को, घास के समान हरे, अङ्कुरों के समान ऊपर को उठी हुई किरणों से चमकती हुई मरकत मणियों को और मूंगों के टुकड़ों को देखकर समुद्र केवल जलमात्र शेष रह गया हो, (ऐसा) दिखायी देता है।
यहाँ (उज्जयिनी में) वत्सदेश के राजा (उदयन) ने प्रद्योत की प्रिय पुत्री (वासवदत्ता) का अपहरण किया था, यहाँ उसी राजा (प्रद्योत) का स्वर्णमय ताल (ताड़) वृक्षों का वन था, यहाँ नलगिरि नामक हाथी मद से खम्बे को उखाड़कर घूमता फिरा। इस प्रकार (पुरानी कथाओं के) जानकार लोग बाहर से आये हुये बसुओं का मनोरंजन करते हैं।
जालियों में से निकलते हुए केशों को सुगन्धित करने वाले धूपों (सुगन्धित द्रव्यों के धुँए) से पुष्ट शरीर वाले, मित्र के स्नेह के कारण भवनों के मोरों द्वारा नृत्य का उपहार दिये गये, पुष्पों से सुगन्धित सुन्दरियों के चरणों के लाक्षारस से चिन्हित महलों में इस (उज्जयिनी) के महलों की शोभा को देखते हुए मार्ग की थकान को दूर करना।
यह मेघ हमारे) स्वामी (शिव) के कण्ठ के समान कान्ति वाला है, इस विचार से गणों द्वारा आदरपूर्वक देखा जाता हुआ, तीनों लोकों के गुरु, पार्वती के पति शिव के पवित्र स्थान (मन्दिर) जाना, (जो) कमल पराग से सुगन्धित (तथा) जल-क्रीड़ा में लगी हुई युवतियों के स्नान से सुवासित गयवन्ती नदी के वायुओं से कम्पित उद्यान वाला है।
हे मेघ! महाकाल मन्दिर में अन्य समय में भी पहुँचकर जब तक सूर्य नेत्रों के विषय को पार करता है (अस्त होता है) तब तक ठहरना चाहिये। शूलधारी शिव की सन्ध्याकालीन प्रशंसनीय पूजा में नगाड़े का काम करते हुए गम्भीर गर्जनों के पूर्ण फल को प्राप्त करोगे।
वहाँ (सन्ध्या-समय में) पैरों की गति के साथ बजती हुई करधनियों वाली, विलासपूर्वक डुलाये हुए, रत्नों की कान्तियों से विभूषित दण्डों वाले चैवरों से थके हुए हाथों वाली वेश्यायें तुमसे नखक्षतों को सुख देने वाली वर्षा की प्रथम बूँदों को प्राप्त करके तुम पर भ्रमरों की पंक्तियों के समान लम्बे कटाक्षों को छोड़ेंगी।
संध्या की पूजा के बाद शिव के (ताण्डव) नृत्य के आरम्भ में, ताजे जपा के पुष्प के समान लाल संध्याकालीन कान्ति को धरण करते हुए ऊँचे भुजा रूपी वृक्षों के बन को मण्डलाकार रूप में व्याप्त करके, पार्वती द्वारा भय रहित निश्चल नेत्रों से देखी गयी भक्ति वाले (तुम, उस शिव की) गीले हस्ति-चर्म की इच्छा को दूर कर देना।
वहाँ (उज्जयिनी में) रात्रि में प्रेमियों के घर जाती हुई स्त्रियों को अत्यन्त गाढ़े अन्धकार के कारण दिखायी न देने वाले राजमार्ग को कसौटी पर खींची गयी स्वर्ण रेखा के समान चमकने वाली बिजली से भूमि को (मार्ग को) दिखलाना। जलवर्षा तथा गर्जन द्वारा शब्दायमान (वाचाल) मत होना। वे स्त्रियां डरपोक होती हैं।
बहुत देर तक चमकने के कारण थकी हुई बिजली रूपी स्त्री वाले आप, सोये हुए कबूतरों वाली किसी महल की छत पर वह रात्रि बिताकर सूर्य के दिखायी देने पर पुनः शेष मार्ग को तय करना। (क्योंकि) मित्र के प्रयोजन का कार्य स्वीकार कर लेने वाले (व्यक्ति) विलम्ब नहीं करते।
उस समय (सूर्योदय के समय) प्रियतमों को (अपनी) खण्डिता नायिकाओं के आँसुओं को शान्त करना है, (अतः) तुम सूर्य के मार्ग को शीघ्र छोड़ देना। कमलिनी के कमल रूपी मुख से ओस रूपी आँसू पोंछने के लिये वापिस आया हुआ, वह (सूर्य) भी तुम्हारे द्वारा किरण (रूपी) हाथों को रोक लेने पर अत्यधिक क्रुद्ध हो जायेगा।
गम्भीरा नदी के निर्मल चित्त की तरह जल में स्वभाव से सुन्दर तुम्हारा छाया शरीर भी प्रवेश प्राप्त करेगा, इस कारण से तुम उसकी (गम्भीरा नदी की) कुमुद की तरह उज्ज्वल चञ्चल मछलियों की उछाल रूपी चितवनों को, धीरता के कारण निष्फल करने के योग्य नहीं हो।
हे मित्र! बेंत की शाखाओं तक पहुँचे हुए (अतः) मानों कुछ हाथ में पकड़े हुए तट रूपी नितम्ब को छोड़े हुए, उसके (गम्भीरा के) नीले जल रूपी वश्व को हटाकर (उस पर) झुके हुए तुम्हारा गमन बड़ी कठिनाई से होगा। (भोग-विलास के) स्वाद को जान लेने वाला कौन (पुरुष) उघड़ी जांघों वाली (कामिनी) को छोड़ने में समर्थ होगा।
तेरे बरसने से फूली हुई पृथ्वी की गंध के संसर्ग से रमणीय हाथियों द्वारा नाक के छिद्रों में शब्द के साथ सुन्दर रूप में पिया जाता हुआ, वन के गूलरों को पकाने वाला शीतल वायु देवगिरि की ओर जाने के इच्छुक तेरे नीचे वहेगा (चलेगा)।
अपने आपको पुष्पो का मेघ बनाये हुए आप आकाश गङ्गा के जल से भीगे हुए पुष्पों की धारावृष्टियों से वहाँ (देवगिरि पर) स्थायी रूप से निवास करने वाले कार्तिकेय को स्नान कराना, क्योंकि वह (कार्तिकेय) इन्द्र की सेनाओं की रक्षा के लिए नवीन चन्द्रमा को धारण करने वाले (शिव) के द्वारा अग्नि के मुख में सञ्चित किया हुआ, सूर्य का भी अतिक्रमण करने वाला तेज है।
कान्ति की रेखाओं के मण्डल वाले, गिरे हुये जिसके पंख को पार्वती पुत्र स्नेह से कमल की पंखुड़ी के साथ कान में धारण करती हैं, शिव के सिर पर स्थित चन्द्रमा की कान्ति से धुले हुये नेत्र-प्रान्तों वाले कार्तिकेय के (वाहन) उस मयूर को, बाद में पर्वत के द्वारा ग्रहण करने से (अर्थात् प्रतिध्वनि से) बड़े हुये गर्जनों से नचाना।
इस सरकण्डों के वन में उत्पन्न देव (कार्तिकेय) की आराधना करके वीणाधारी सिद्धयुगलों द्वारा जल कणों के भय से छोड़े गये मार्ग वाले (तुम, कुछ) मार्ग तय करके गवालम्भ यज्ञ से उत्पन्न पृथ्वी पर नदी रूप में परिवर्तित हुई रन्तिदेव की कीर्ति का सम्मान करते हुये झुक जाना।
कृष्ण की कान्ति को चुराने वाले तुम्हारे जल लेने के लिये झुकने पर आकाश में विचरण करने वाले (देवगण) विशाल होने पर भी दूर होने के कारण क्षीण उस चर्मण्वती के प्रवाह को अवश्य ही दृष्टि बाँध कर (इस प्रकार) देखेंगे मानो पृथ्वी के एक लड़े हार के बीच एक स्थूल इन्द्रनील मणि (सुशोभित) हो।
उस (चर्मण्वती) को पार करके अपने स्वरूप को, भौंहरूपी लताओं के विलास से परिचित, पलकों को ऊपर उठाने से, ऊपर शोभायमान् श्याम श्वेत तथा लाल कान्ति से युक्त (और) कुन्द पुष्पों के हिलने-डुलने का अनुसरण करने वाले भौरों की शोभा को चुराने वाले, दशपुर की स्त्रियों के नयनों को कौतूहलों का पात्र बनाते हुये जाना।
इसके बाद ब्रह्मावर्त नामक जनपद में (अपनी) छाया द्वारा प्रवेश करते हुए (तुम) क्षत्रियों के युद्ध के सूचक कुरुक्षेत्र का सेवन करना, जहाँ गाण्डीव धनुष को धारण करने वाले (अर्जुन) ने असंख्य तीक्ष्ण बाणों की राजाओं के मुखों पर वर्षा की थी, जिस प्रकार तुम जलधाराओं की वर्षा कमलों पर करते हो।
बन्धुओं के स्नेह के कारण युद्ध से पराङ्मुख, हल धारण करने वाले (बलराम) ने अभीष्ट स्वाद वाली और रेवती की आँखों के प्रतिबिम्व वाली मदिरा को छोड़कर जिस (जल) का सेवन किया था, उस सरस्वती नदी के जलों को प्राप्त करके तुम भी हृदय से शुद्ध हो जाओगे, केवल रंग से ही श्याम (रहोगे)।
वहाँ से (कुरुक्षेत्र से) कनखल के समीप पर्वतराज (हिमालय) से उतरी हुई, सगर के पुत्रों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी, जहनु की पुत्री गङ्गा पर जाना। पार्वती के मुख पर धूभङ्ग का झागों से मानो उपहास करके चन्द्रमा में लगे तरंग रूपी हाथ वाली जिस (गङ्गा) ने शिव के बालों को पकड़ा था।
देवों के हाथी के समान आकाश में पिछले आये भाग (के सहारे) से लटके हुए तुम यदि उसके (गङ्गा के) स्वच्छ स्फटिक के समान निर्मल जल को तिरछे होकर पीने का विचार करोगे तो वह (गङ्गा) तुरन्त ही प्रवाह में साथ-साथ चलती हुई आपकी परछाईं से, (प्रयाग से) भिन्न स्थान में यमुना सङ्गम को प्राप्त हुई-सी सुन्दर हो जायेगी।
बैठे हुए मृगों की कस्तूरी की गंध से सुगन्धित शिलाओं वाले, उस (गङ्गा) के ही उद्गमस्थल, बर्फ से श्वेत पर्वत को प्राप्त करके मार्ग की थकावट को दूर करने वाले उसके शिखर पर स्थित (तुम) श्वेत शिव के बैल द्वारा उखाड़ी गयी कीचड़ से तुलना किये जाने योग्य शोभा को धारण करोगे।
वायु के चलने पर देवदारु वृक्षों के तनों की रगड़ से उत्पन्न (तथा) ज्वालाओं से चमरी गायों के बालों के समूह को जला देने वाली वन की आग उस (हिमालय) को पीड़ित करे (तो) (तुम) इस (आग) को जल की हजारों धाराओं से शान्त करने के लिए समर्थ हो; क्योंकि श्रेष्ठ (लोगो) की सम्पत्तियाँ दुःखी लोगों के कष्टों को शान्त करने रूप फल वाली होती हैं।
उस (हिमालय) पर क्रोध के कारण उछलने में वेग वाले जो शरभ रास्ता छोड़ देने वाले आपको शीघ्र अपने अङ्गों को नष्ट करने के लिए लान्घे उन्हें भयङ्कर ओलों की वर्षा गिराकर तितर-बितर कर देना अथवा व्यर्थ काम करने वाले कौन तिरस्कार के विषय नहीं होते।
वहाँ (हिमालय में) शिला पर प्रकट हुए, सिद्ध नामक देवों द्वारा निरन्तर की गयी पूजा वाले, भगवान् शिव के चरण चिह्नों की भक्ति से झुककर प्रदक्षिणा करना, जिस (चरण चिह्न) को देख लेने पर पाप मुक्त हुए श्रद्धालुजन शरीर त्याग के बाद (शिव के) गणों के शाश्वत पद को प्राप्त करने में समर्थ होते है।
वायु से भरे हुए बाँस मधुर शब्द करते हैं, प्रेम से भरी हुई किन्नर स्त्रियां त्रिपुर विजय का गान गाती है, यदि गुफाओं में तुम्हारा गर्जन नगाड़े के शब्द के समान हो जाये (तो) वहाँ शिव के संगीत की सामग्री निश्चय ही पूर्ण हो जायेगी।
हिमालय पर्वत के तट के पास उन विशेष (द्रष्टव्य) वस्तुओं को लाँधकर जो हंसों के द्वार (तथा) भृगुकुल के स्वामी (परशुराम) के यश का मार्ग क्रोश्च पर्वत का छिद्र है, उसमे बलि नामक राक्षस बाँधने के लिए तत्पर विष्णु के काले पैर के समान तिरछे हुए आकार से शोभा वाले (तुम) उत्तर दिशा में जाना।
और ऊपर को जाकर (तुम) दश मुख वाले (रावण) की भुजाओं द्वारा शिथिल किये शिखरों के जोड़ों वाले, देवताओं की स्त्रियों के दर्पण, कैलाश के अतिथि होना, कुमुद पुष्यों के समान श्वेत शिखरों की ऊँचाइयों से आकाश को व्याप्त करके स्थित हुआ जो (कैलाश) मानो, प्रतिदिन इकट्ठा हुआ शिव का अट्टहास (ठहाका) है।
चिकने पिसे हुए काजल के समान कान्ति वाले तुम्हारे (कैलाश की) चोटी पर पहुँचने पर अभी-अभी काटे हुए हाथी के दाँत के टुकड़े के समान श्वेत उसी (कैलाश) पर्वत की नीले वस्त्र के कंधे पर रखा हुआ होने पर हलधर के समान अपलक नेत्रों से देखी जाने योग्य शोभा को देखने की संभावना करता हूँ।
और उस क्रीड़ा पर्वत (कैलाश) पर सर्प रूपी कड़े को त्यागकर शिव द्वारा दिये गये हाथ वाली पार्वती यदि पैदल विचरण कर रही हो, (तो) आगे जाकर (अपने) अन्दर जल के प्रवाह को ठोस बनाये हुए होकर पैड़ियों के आकार में शरीर को बनाकर (तुम) मणियों के तट पर चढ़ने के लिए सीढ़ी का काम करना।
वहाँ (कैलाश पर्वत) पर अवश्य ही देवाङ्गनाएँ कङ्गनों की नोकों के प्रहारों से जल बरसाने वाले तुमको फव्वारे के रूप में बना डालेंगी। हे मित्र! गर्मी से प्राप्त हुए तुम्हारा यदि उन (देवाङ्गनाओं) से छुटकारा न होवे (तो) क्रीड़ा में लगी हुई उनको कानों को कठोर लगने वाले गर्जनों से डरा देना।
हे मेघ! सुनहले कमलों को उत्पन्न करने वाले मानसरोवर के जल को ग्रहण करते हुए, ऐरावत को क्षण भर के लिए मुख पर वस्त्र का आनन्द देते हुए (और) कल्पवृक्ष के पल्लवों को मानो सूक्ष्म वस्त्रों की भाँति वायु से हिलाते हुए अनेक प्रकार की चेष्टाओं वाले विलासों से पर्वतराज (कैलाश) का इच्छानुसार उपभोग करना।
हे इच्छानुसार विचरण करने वाले (मेघ)! प्रेमी के समान उस (कैलाश पर्वत) की गोद में खिसके हुए गङ्गा के समान श्वेत दुपट्टे वाली, अलका (पुरी) को देखकर तुम न जान सकोगे (ऐसा) नहीं (है); ऊँचे सात मञ्जिल भवनों वाली जो (अलकापुरी) तुम्हारे समय (वर्षा काल) में जल बरसाने वाले मेघ समूह को, (वैसे ही धारण करती है) जैसे स्त्री मोतियों के गुच्छे से गूंथे हुए केशों को धारण करती है।
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