इस सरकण्डों के वन में उत्पन्न देव (कार्तिकेय) की आराधना करके वीणाधारी सिद्धयुगलों द्वारा जल कणों के भय से छोड़े गये मार्ग वाले (तुम, कुछ) मार्ग तय करके गवालम्भ यज्ञ से उत्पन्न पृथ्वी पर नदी रूप में परिवर्तित हुई रन्तिदेव की कीर्ति का सम्मान करते हुये झुक जाना।
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