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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 48
आराध्यैनं शरवणभर्व देवमुल्लङ्घित्ताध्वा सिद्धद्वन्द्वैर्जलकणभयाद्वीणिभिर्मुक्तमार्गः । व्यालम्बेथाः सुरभितनयालम्भजां मानयिष्यन्स्रोतोमूर्त्या भुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम् ॥
इस सरकण्डों के वन में उत्पन्न देव (कार्तिकेय) की आराधना करके वीणाधारी सिद्धयुगलों द्वारा जल कणों के भय से छोड़े गये मार्ग वाले (तुम, कुछ) मार्ग तय करके गवालम्भ यज्ञ से उत्पन्न पृथ्वी पर नदी रूप में परिवर्तित हुई रन्तिदेव की कीर्ति का सम्मान करते हुये झुक जाना।
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