तस्याः किञ्चित्करधृतमिव प्राप्तवानीरशाखं हृत्वा नीलं सलिलवसनं मुक्तरोधोनितम्बम् ।
प्रस्थानं ते कथमपि सखे लम्बमानस्य भावि ज्ञातास्वादो विवृतजघनां को विहातुं समर्थः ॥
हे मित्र! बेंत की शाखाओं तक पहुँचे हुए (अतः) मानों कुछ हाथ में पकड़े हुए तट रूपी नितम्ब को छोड़े हुए, उसके (गम्भीरा के) नीले जल रूपी वश्व को हटाकर (उस पर) झुके हुए तुम्हारा गमन बड़ी कठिनाई से होगा। (भोग-विलास के) स्वाद को जान लेने वाला कौन (पुरुष) उघड़ी जांघों वाली (कामिनी) को छोड़ने में समर्थ होगा।
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