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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 8
त्वामारूढं पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ताः प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसत्य:। कः सन्नद्धे विरहविधुरां त्वव्युपेक्षेत जार्या न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः ॥
वायु मार्ग में (आकाश में) चढ़े हुए तुमको परदेश गये हुए व्यक्तियों की स्त्रियां (पति के शीघ्र आगमन के) विश्वास से आश्वस्त होकर बालों के अग्रभाग को ऊपर पकड़े हुए उत्कण्ठा से देखेंगी। (क्योंकि) तुम्हारे उमड़ने पर विरह से व्याकुल पत्नी की कौन उपेक्षा करेगा? दूसरा भी जो व्यक्ति मेरे समान दूसरों के अधीन आजीविका वाला न हो।
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