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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 46
तत्र स्कन्दं नियतवसति पुष्पमेघीकृतात्मा पुष्पासारैः स्नपयतु भवान्व्योमगङ्गाजलार्दैः । रक्षाहेतोर्नवशशिभृता वासवीनां चमूनामत्यादित्यं हुतवहमुखे सम्भूतं तद्धि तेजः ।॥
अपने आपको पुष्पो का मेघ बनाये हुए आप आकाश गङ्गा के जल से भीगे हुए पुष्पों की धारावृष्टियों से वहाँ (देवगिरि पर) स्थायी रूप से निवास करने वाले कार्तिकेय को स्नान कराना, क्योंकि वह (कार्तिकेय) इन्द्र की सेनाओं की रक्षा के लिए नवीन चन्द्रमा को धारण करने वाले (शिव) के द्वारा अग्नि के मुख में सञ्चित किया हुआ, सूर्य का भी अतिक्रमण करने वाला तेज है।
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