तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव स्रस्तगङ्गादुकूलां न त्वं दृष्ट्वा पुनरलको ज्ञास्यसे कामचारिन् ।
या वः काले वहति सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना मुक्ताजालप्रथितमलकं मेघदूतम् कामिनीवानवृन्दम् ।।
हे इच्छानुसार विचरण करने वाले (मेघ)! प्रेमी के समान उस (कैलाश पर्वत) की गोद में खिसके हुए गङ्गा के समान श्वेत दुपट्टे वाली, अलका (पुरी) को देखकर तुम न जान सकोगे (ऐसा) नहीं (है); ऊँचे सात मञ्जिल भवनों वाली जो (अलकापुरी) तुम्हारे समय (वर्षा काल) में जल बरसाने वाले मेघ समूह को, (वैसे ही धारण करती है) जैसे स्त्री मोतियों के गुच्छे से गूंथे हुए केशों को धारण करती है।
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