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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 4
प्रत्यासन्ने नभसि' दयिताजीवितालम्बनार्थी जीमूतेन स्वकुशलमयीं हारयिष्यन्प्रवृत्तिम् । स प्रत्यमैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ।।
श्रावण मास के निकट आने पर प्रिया के जीवन को सहारा देने के इच्छुक उस (यक्ष) ने मेघ द्वारा अपने कुशलमय समाचार को भेजने की इच्छा से तत्काल तोड़े गये (ताजे) कूटज (पर्वतीय चमेली) के पुष्पों से अर्घ्य सामग्री तैयार करके (पूजा करके) उस (मेघ) के लिए प्रसन्नतापूर्वक प्रणय भरे वचनों से स्वागत कहा।
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