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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 36
भर्तुः कण्ठच्छविरिति गणैः सादरं वीक्ष्यमाणः पुण्यं यायास्त्रिभुवनगुरोर्धांम चण्डीश्वरस्य । धूतोद्यानं कुवलयजोगन्थिंभिर्गन्धवत्या- स्तोयक्रीडानिरत युवतिस्नानतिक्तैर्मरुद्भिः ॥
यह मेघ हमारे) स्वामी (शिव) के कण्ठ के समान कान्ति वाला है, इस विचार से गणों द्वारा आदरपूर्वक देखा जाता हुआ, तीनों लोकों के गुरु, पार्वती के पति शिव के पवित्र स्थान (मन्दिर) जाना, (जो) कमल पराग से सुगन्धित (तथा) जल-क्रीड़ा में लगी हुई युवतियों के स्नान से सुवासित गयवन्ती नदी के वायुओं से कम्पित उद्यान वाला है।
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