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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 37
अप्यन्यस्मिञ्जलघर महाकालमासाद्य काले स्थातव्यं ते नयनविषयं यावदत्येति भानुः । कुर्वन्सङ्ख्याबलिपटहतां शूलिनः श्लाघनीया- मामन्द्राणां फलमविकलं लप्स्यसे गर्जितानाम् ।।
हे मेघ! महाकाल मन्दिर में अन्य समय में भी पहुँचकर जब तक सूर्य नेत्रों के विषय को पार करता है (अस्त होता है) तब तक ठहरना चाहिये। शूलधारी शिव की सन्ध्याकालीन प्रशंसनीय पूजा में नगाड़े का काम करते हुए गम्भीर गर्जनों के पूर्ण फल को प्राप्त करोगे।
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