मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 65
हेमाम्भोजप्रसवि सलिलं मानसस्याददानः कुर्वन्कार्म क्षणमुखपटप्रीतिमैरावतस्य । धुन्वन्कल्पद्रुमकिसलयान्यंशुकानीव वातैर्नानाचेष्टैर्जलद ललितैर्निर्विशेस्तं नगेन्द्रम् ॥
हे मेघ! सुनहले कमलों को उत्पन्न करने वाले मानसरोवर के जल को ग्रहण करते हुए, ऐरावत को क्षण भर के लिए मुख पर वस्त्र का आनन्द देते हुए (और) कल्पवृक्ष के पल्लवों को मानो सूक्ष्म वस्त्रों की भाँति वायु से हिलाते हुए अनेक प्रकार की चेष्टाओं वाले विलासों से पर्वतराज (कैलाश) का इच्छानुसार उपभोग करना।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मेघदूतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मेघदूतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें