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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 42
तस्मिन्काले नयनसलिलं योषितां खण्डितानां शान्तिं नेयं प्रणयिभिरतो वर्त्य भानोस्त्यजाशु । प्रालेयास्रं कमलवदनात्सोऽपि हर्तुं नलिन्याः प्रत्यावृत्तस्त्वयि कररुधि स्यादनल्पाभ्यसूयः ।।
उस समय (सूर्योदय के समय) प्रियतमों को (अपनी) खण्डिता नायिकाओं के आँसुओं को शान्त करना है, (अतः) तुम सूर्य के मार्ग को शीघ्र छोड़ देना। कमलिनी के कमल रूपी मुख से ओस रूपी आँसू पोंछने के लिये वापिस आया हुआ, वह (सूर्य) भी तुम्हारे द्वारा किरण (रूपी) हाथों को रोक लेने पर अत्यधिक क्रुद्ध हो जायेगा।
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