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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 14
अद्रेः शृङ्गं हरतिः पवनः किंस्विदित्युन्मुखीभि- र्दृष्टोत्साहश्चकितचकितं' मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः । स्थानादत्स्मात्सरसनिचुलादुत्पतोदङ्‌मुखः खं दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपान् ।।
वायु पर्वत की चोटी को लिये जा रहा है क्या? इस (विचार) से ऊपर को मुख किये हुए भोली-भाली सिद्धों की स्त्रियों द्वारा अत्यधिक आश्चर्य के साथ देखे गये उत्साह वाला, मार्ग में दिग्गजों की मोटी सूंडों के प्रहारों को बचाते हुए (तुम) उस सरस वेतों के स्थान से उत्तर की ओर मुख वाले होकर आकाश में उड़ जाओ।
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