और ऊपर को जाकर (तुम) दश मुख वाले (रावण) की भुजाओं द्वारा शिथिल किये शिखरों के जोड़ों वाले, देवताओं की स्त्रियों के दर्पण, कैलाश के अतिथि होना, कुमुद पुष्यों के समान श्वेत शिखरों की ऊँचाइयों से आकाश को व्याप्त करके स्थित हुआ जो (कैलाश) मानो, प्रतिदिन इकट्ठा हुआ शिव का अट्टहास (ठहाका) है।
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