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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 58
तत्र व्यक्तं दृषदि चरणन्यासमर्थेन्दुमौलेः शश्वत्सिद्वैरुपचितबलि' भक्तिनम्नः परीयाः । यस्मिन्दृष्टेकरणविगमादूर्ध्वमुद्भूतपापाः कल्पिष्यन्ते स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः ॥
वहाँ (हिमालय में) शिला पर प्रकट हुए, सिद्ध नामक देवों द्वारा निरन्तर की गयी पूजा वाले, भगवान् शिव के चरण चिह्नों की भक्ति से झुककर प्रदक्षिणा करना, जिस (चरण चिह्न) को देख लेने पर पाप मुक्त हुए श्रद्धालुजन शरीर त्याग के बाद (शिव के) गणों के शाश्वत पद को प्राप्त करने में समर्थ होते है।
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