(वहाँ नीचैः पर्वत पर) विश्राम करके वन नदी के किनारे उत्पन्न उपवनों की जूही की कलियों को नये जल की बूंदों से सींचते हुए (और) कपोलों पर पसीने को हटाने से उत्पन्न पीड़ा से मुरझा गये हैं कानों के कमल जिनके ऐसे, पुष्प तोड़ने वाली स्त्रियों (मालिनों) के मुखों को छाया देने के कारण क्षण भर परिचित होते हुए आगे बढ़ना।
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