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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 32
दीर्घाकुर्वन्पटु मदकलं कूजितं सारसानां प्रत्यूषेषु स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः । यत्र स्त्रीणां हरति सुरतग्लानिमङ्गानुकूलः । शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः ॥
जहां (उज्जयिनी में) प्रातःकाल में सारसों के तीव्र मद से अव्यक्त मधुर कूजन को अधिक बढ़ाता हुआ, खिले हुए कमलों की सुगन्ध के सम्पर्क से सुगन्धित, अङ्गों को सुख देने वाला शिप्रा नदी का पवन, (रति) याचना में मीठे वचन बोलने वाले प्रियतम के समान, स्त्रियों की सम्भोग की थकान को दूर करता है।
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