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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 52
हित्वा हालामभिमतरसां रेवतीलोचनाङ्कां बन्धुप्रीत्या समरविमुखो लाङ्गली याः सिषेवे । कृत्वा तासामधिगममर्पा' सौम्य सारस्वतीनामन्तः शुद्धस्त्वमपि भविता वर्णमात्रेण कृष्णः ॥
बन्धुओं के स्नेह के कारण युद्ध से पराङ्‌मुख, हल धारण करने वाले (बलराम) ने अभीष्ट स्वाद वाली और रेवती की आँखों के प्रतिबिम्व वाली मदिरा को छोड़कर जिस (जल) का सेवन किया था, उस सरस्वती नदी के जलों को प्राप्त करके तुम भी हृदय से शुद्ध हो जाओगे, केवल रंग से ही श्याम (रहोगे)।
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