मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 49
त्वय्यादातुं जलमवनते शाङ्गिणो वर्णचौरे तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात्प्रवाहम् । प्रेक्षिष्यन्ते गगनगतयो' नूनमावर्ज्य दृष्टिरेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम् ॥
कृष्ण की कान्ति को चुराने वाले तुम्हारे जल लेने के लिये झुकने पर आकाश में विचरण करने वाले (देवगण) विशाल होने पर भी दूर होने के कारण क्षीण उस चर्मण्वती के प्रवाह को अवश्य ही दृष्टि बाँध कर (इस प्रकार) देखेंगे मानो पृथ्वी के एक लड़े हार के बीच एक स्थूल इन्द्रनील मणि (सुशोभित) हो।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मेघदूतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मेघदूतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें