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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 3
तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो रन्तर्वाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दब्यौ । मेधालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्ति चेतः कण्ठाश्लेषप्रायिनि जने कि पुनर्दूरसंस्थे ॥
यक्षों के राजा (कुबेर) का सेवक अन्दर ही आँसुओं को रोके हुए, उत्कण्ठा को उत्पन करने वाले उस (मेघ) के सामने किसी प्रकार ठहर कर देर तक सोचता रहा। मेघ के दर्शन होने पर सुखी (व्यक्ति) का भी चित्त दूसरे प्रकार की वृत्ति वाला (चंचल) हो जाता है, (फिर) कण्ठ के आलिङ्गन के इच्छुकजन (प्रिया) के दूर स्थित होने पर तो कहना ही क्या।
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