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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 47
ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य बर्ह भवानी पुत्रप्रेम्णा कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति । धौताऽपार्ट्स हरशशिरुचा पावकेस्तं' मयूरं पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः ॥
कान्ति की रेखाओं के मण्डल वाले, गिरे हुये जिसके पंख को पार्वती पुत्र स्नेह से कमल की पंखुड़ी के साथ कान में धारण करती हैं, शिव के सिर पर स्थित चन्द्रमा की कान्ति से धुले हुये नेत्र-प्रान्तों वाले कार्तिकेय के (वाहन) उस मयूर को, बाद में पर्वत के द्वारा ग्रहण करने से (अर्थात् प्रतिध्वनि से) बड़े हुये गर्जनों से नचाना।
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