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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 62
उत्पश्यामि त्वयि तटगते स्निग्धभिन्नाञ्जनाभे सद्यः कृत्तद्विरददशनच्छेदगौरस्य तस्य । शोभामद्रेः स्तिमितनयनप्रेक्षणीयां भवित्रीमंसन्यस्ते सति हलभृतो मेचके वाससीव ॥
चिकने पिसे हुए काजल के समान कान्ति वाले तुम्हारे (कैलाश की) चोटी पर पहुँचने पर अभी-अभी काटे हुए हाथी के दाँत के टुकड़े के समान श्वेत उसी (कैलाश) पर्वत की नीले वस्त्र के कंधे पर रखा हुआ होने पर हलधर के समान अपलक नेत्रों से देखी जाने योग्य शोभा को देखने की संभावना करता हूँ।
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