कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलीन्श्चामवख्यां तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः ।
आ कैलासाद् बिसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः संपत्पस्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहाया ।।
और जो पृथ्वी को उगे हुए कुकुरमुत्तों वाली उपजाऊ बनाने में समर्थ है, उस कानों को सुख देने वाले तुम्हारे गर्जन को सुनकर मानसरोवर के लिए उत्सुक, कमलनाल के अग्रभाग के टुकड़ों को मार्ग का भोजन बनाने वाले राजहंस कैलाश (पर्वत) तक आकाश में तुम्हारे साथी होंगे।
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