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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 63
हित्वा तस्मिन् भुजगवलयं शम्भुना दत्तहस्ता क्रीडाशैले यदि च विचरेत् पादचारेण गौरी । भङ्गीभक्त्या विरचितवपुः स्तम्भितान्तर्जलौघः सोपानत्वं कुरु मणितटारोहणायाप्रयायी' ।।
और उस क्रीड़ा पर्वत (कैलाश) पर सर्प रूपी कड़े को त्यागकर शिव द्वारा दिये गये हाथ वाली पार्वती यदि पैदल विचरण कर रही हो, (तो) आगे जाकर (अपने) अन्दर जल के प्रवाह को ठोस बनाये हुए होकर पैड़ियों के आकार में शरीर को बनाकर (तुम) मणियों के तट पर चढ़ने के लिए सीढ़ी का काम करना।
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