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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 16
त्वय्यायत्तं कृषिफलमितिः भूविलासानभिज्ञैः' प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः । सद्यः सीरोत्कषणसुरभि क्षेत्रमारुह्य मालं किञ्चित्पश्चाद् व्रज' लघुगतिर्भूय एवोत्तरेण ॥
खेती का फल तुम्हारे अधीन है, इस कारण स्नेह से आद्र भौंहों के विलास से अपरिचित ग्रामीण स्त्रियों की आँखों से पिये जाते हुए (अत्यन्त प्रेमपूर्वक देखे जाते हुए) (तुम) माल नामक देश पर, जो तत्काल हल से जोता जाने के कारण सुगन्धित हो जायेगा, चढ़कर कुछ पश्चिम की ओर जाना (और) फिर तीव्र गति वाला होकर उत्तर की ओर ही (जाना)।
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