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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 17
त्वामासारप्रशमितवनोपप्लवं' साधुमूर्ध्या वक्ष्यत्यध्वश्रमपरिगतं सानुमानाम्नकूटः । न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः कि पुनर्यस्तथोच्चैः ॥
आम्रकूट पर्वत, मूसलाधार वर्षा से दावाग्नि को बुझाने वाले, मार्ग की थकान से व्याप्त तुमको अच्छी प्रकार सिर पर धारण करेगा, (क्योंकि) अधम (व्यक्ति) भी मित्र के आश्रय के लिए आने पर पहले के उपकारों को विचार कर, विमुख नहीं होता, (फिर) जो उतना ऊंचा (महान्) है, उसका तो कहना ही क्या?
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