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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 35
जालोद्रीर्णैरुपचितवपुः केशसंस्कारधूपै र्बन्धुप्रीत्या भवनशिखिभिर्दत्तनृत्योपहारः । हर्येष्वस्याः कुसुमसुरभिध्वध्वखेदं नयेथाः लक्ष्मीं पश्यं'ल्ललितवनितापादरागाङ्कितेषु ।।
जालियों में से निकलते हुए केशों को सुगन्धित करने वाले धूपों (सुगन्धित द्रव्यों के धुँए) से पुष्ट शरीर वाले, मित्र के स्नेह के कारण भवनों के मोरों द्वारा नृत्य का उपहार दिये गये, पुष्पों से सुगन्धित सुन्दरियों के चरणों के लाक्षारस से चिन्हित महलों में इस (उज्जयिनी) के महलों की शोभा को देखते हुए मार्ग की थकान को दूर करना।
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