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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 53
तरप्रागच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णो जल्लोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपानपंक्तिम् । गौरीवक्त्रसुकुटिरचनां' या विहस्येव फेनैः मेघदूतम् शम्भोः केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्मिहस्ता ॥
वहाँ से (कुरुक्षेत्र से) कनखल के समीप पर्वतराज (हिमालय) से उतरी हुई, सगर के पुत्रों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी, जहनु की पुत्री गङ्गा पर जाना। पार्वती के मुख पर धूभङ्ग का झागों से मानो उपहास करके चन्द्रमा में लगे तरंग रूपी हाथ वाली जिस (गङ्गा) ने शिव के बालों को पकड़ा था।
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