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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 60
प्रालेयाद्रेरुपतटमतिक्रम्य तांस्तान्विशेषान् हंसद्वारं भृगुपतियशोवर्म यत्क्रौञ्चरञ्चम् । तेनोदीचीं दिशमनुसरेस्तिर्यगायामशोधी श्यामः पादो बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव' विष्णोः ॥
हिमालय पर्वत के तट के पास उन विशेष (द्रष्टव्य) वस्तुओं को लाँधकर जो हंसों के द्वार (तथा) भृगुकुल के स्वामी (परशुराम) के यश का मार्ग क्रोश्च पर्वत का छिद्र है, उसमे बलि नामक राक्षस बाँधने के लिए तत्पर विष्णु के काले पैर के समान तिरछे हुए आकार से शोभा वाले (तुम) उत्तर दिशा में जाना।
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