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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 56
तं चेद्वायौ सरति सरलस्कन्धसंघट्टजन्मा बाघेतोल्काक्षपितचमरीबालभारो दवाग्निः । अर्हस्येनं शमयितुमलं वारिधारासहस्त्रैरापन्नार्तिप्रशमनफलाः सम्पदो हृह्यत्तमानाम् ।।
वायु के चलने पर देवदारु वृक्षों के तनों की रगड़ से उत्पन्न (तथा) ज्वालाओं से चमरी गायों के बालों के समूह को जला देने वाली वन की आग उस (हिमालय) को पीड़ित करे (तो) (तुम) इस (आग) को जल की हजारों धाराओं से शान्त करने के लिए समर्थ हो; क्योंकि श्रेष्ठ (लोगो) की सम्पत्तियाँ दुःखी लोगों के कष्टों को शान्त करने रूप फल वाली होती हैं।
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