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मेघदूतम् • अध्याय 1 • श्लोक 15
रलच्छायाव्यतिकर' इव प्रेक्ष्यमेतत्पुरस्ताद् वल्मीकाग्रात्प्रभवति धनुः खण्डमाखण्डलस्य । येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापत्स्यते ते बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः ॥
रत्नों की कान्तियों के मिश्रण के समान दर्शनीय यह इन्द्रधुनष का टुकड़ा सामने बाँबी के अग्र भाग से निकल रहा है, जिससे तुम्हारा श्याममल शरीर उज्ज्वल कान्ति वाले मोर के पंख से गोपवेश धारण करने वाले विष्णु (कृष्ण) के श्यामल शरीर के समान अत्यन्त शोभा को प्राप्त होगा।
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