उस (पूर्वोक्त रामगिरि) पर्वत पर प्रिया से वियुक्त स्वर्ण कंगण के गिरने से शून्य कलाई वाले कामुक उस (यक्ष) ने कुछ (अर्थात् आठ) मास विताकर आषाढ़ के प्रथम दिन पर्वत की चोटी से सटे हुए वप्रक्रीड़ा में तिरछा दन्त प्रहार करने वाले हाथी के सदृश दर्शनीय मेघ को देखा।
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